जल रही है ये नगरी तेरी

जल रही है ये नगरी तेरी
राजनीति की ही है ये हेरा फेरी
एकत्व है या खंडित है ये देश अपना
कलम उठी आक्रोश उगलने को ये मेरी

नागरिकता बढ़ाने का ये व्यापार है
गौर करो ये सरकार थोड़ी बीमार है
युवा पिट रहा है खाकी से हक के लिए
ये कहते है पकोड़ो से रोजगार है

एकता की परिभाषा इन्हे कौन सिखलाए
क्यों हीरोगिरी में कुछ चेहरे देश को चलाए
प्रजा को संतुष्ट न करपाए वो प्रजातंत्र कैसा
हक की लड़ाई में हर कोई कैसे मौन चिल्लाए

राज्यो पर अब राज हो रहा है
युवा और किसान हिम्मत खो रहा है
कोई अपनी बात करता है नहीं अब
लगता है जैसे, धोबी धुले कपड़े धो रहा है।
– Nitin poria #Citizenshipamedmentbill

ख्वाब है तू मेरा हर घड़ी
तुझको है कि जाने की है पड़ी
कुछ पल मेरे लिए भी निकाल फुर्सत के
संग तेरे रहने को,
तनहाई मेरी मुझसे बेहद है लडी।

नितिन पोरिया

बहन प्रियंका

हर गली तब सुनसान थी
इंसानियत भी बेजुबान थी
वक़्त भी सहम सा गया था मानो
नीयत जब उनकी हैवान थी

अंधेरे में रोशन चिराग है बहने
दरिंदगी ने छिने उसके शर्म के गहने
सबकी चौखट पर गई वो उस रात
आबरू ना लूटने दो मेरी बस ये कहने

आसमां भी आंसू छोड़ गया
खुदा से हर बन्दा मुंह मोड़ गया
ये बस प्रियंका की ही नहीं है कहानी
हर स्त्री का गर्व ये किस्सा तोड़ गया

यू बैठे रहने से क्या होगा
किसी रात फिर यही सब होगा
आंखें मूंद कर बैठी है जो सरकार
चौराहे पर गोली मारे उनको तभी कुछ भला होगा।
RIP Priyanka – Nitin poria

Umeed nh baaki ab mujhme,

Umeed nh baaki ab mujhme,
M khoju rab ab bs tujhme,
Shorgul m bh ek sannata sunayi deta Hain,
Kisi k jakhm pr lga sku
Vo mrham Nahi ab mujhme,

Tujhe marham lagana q hai
Ye zakhm mitana q hai
Iska bhi lutf le saathi
Bs Soch gumrah y jamanaa q hai

Jamanne m sb chodh chuka
Maikhano s muuh maud chuka
Jaam h ki ab chdhta hi Nahi
Bina manjil m bhut daud chuka

– Nitin poria

खामोशी सी ये मुझमें जो छाई है

खामोशी सी ये मुझमें जो छाई है
बेवक्त गम की बरखा लाई है
खुद ही से अनजान हूं मै अब
क्यों फूलों संग ज़िन्दगी कांटे ये लाई है

गहरे सन्नाटे में समाई है ये जो मेरी तनहाई है
क्या कभी तुम्हे यू बेवजह नींद ना अयी है
बयां भी नहीं करसकता है क्या मर्ज मुझे
याद किसी की आती नहीं, बस एक कमी है जो अधूरी मैंने पाई है

जो हैं नहीं अपना उसको पा कैसे लू
यू मनपसंद चीज को पराया होने कैसे मै अब दू
शायद सपना हैं वो मेरा जो अधूरा रह गया बाकी
अब हकीकत में प्यार का उसको नाम कैसे मै अब दू

नहीं चाहता दिल ये फिर से हो जाए बेगाना
जिसका हो दिल वहीं दिल से मुझे लगाना
जज्बाती हूं हद से ज्यादा थोड़ा खुदगर्ज भी हूं यारो
तबीयत से सोच लू की क्या तुझको हैं अपना बनाना

अगर तू नहीं चाहती कि
मै और तू हम बनजाए
हुई है बस अभी चंद बाते
क्यों ना अभी से हम बिछड़ जाए
अगर ये दिल तुझको दे बैठा मै
तो हौसला ना होगा बिछड़ने का
मै वो पत्थर बन जाउगा
मूरत जिससे तेरी बन जाए

………नितिन poria

हर वक़्त की कदर , याद हो तुझे

हर वक़्त की कदर , याद हो तुझे अगर
मुठ्ठी भर बातें करने की खातिर
कूद गया मै बेशर्मी कि डगर,
बेशर्मी को मेरी तुम गलत मत समझना,
जो आए मन में बेजीझक बोलना

तुम्हारी बेबात की हंसी हसा जाती हैं कभी
याद कर बस यही सब कुछ
वॉट्सएप में चैट खुल जाती है तभी
फिर थोड़ा मायूस होता हूं
थोड़ा नाराज होने का भी दिल करता है
बातो के मेरे बिस्तर पर
तेरा एक गुड नाइट का तकिया तक नहीं होता है

यूं तो कुछ भी नहीं बताने को मेरे पास
तुम कहोगी ऐसा क्या है मुझमें खास
अब बया नहीं कर सकता खासियत की हर बात
गुड नाइट का एक मेसेज भेज देना तुम बस किसी रात

तेरी आंखो में काजल की गहराई हैं कहती
हो अगर मन मर्जी मेरी तो तेरी आंखो में हर पल रहती
तेरे जिद्द करने से भी मैं
इठलाकर आंखो से ही कहती
ध्यान रखा करो खुद का
क्योंकि कोमलता की परछाई
तुम्हारे साए में है रहती।

-नितिन पोरिया

पहला पहला प्यार

पहले पहले प्यार को दिल मे दबोचना
फिर सोचना
नई जगह खोजना,
कर कुछ ऐसा न हो आलोचना
बनू में तुझपे कभी बोझ ना
साथ देना ,बेवफाई का पचता मुझको डोज़ ना
तू फिर से सोचना
नया नही अब थोड़ा खास हु मैं तेरा दोस्त ना
तू बस हस , बस
कभी आंखों से आंसू तू ना छोड़ ना
तोड़ ना , कभी भी कोई वादा ना तोड़ना
जोड़ना थोड़े जज़्बात मुझसे अपने जोड़ना
बोलना जो दिल करे बेफिक्र मुझे बोलना
कभी हो नाराज तो वक़्त मुझको लगना
तुझको मनाने में भेजा मेरा फटना
पर मैं ना कभी थकना,
तुझे हसाने के वास्ते नया कुछ भी हैं मुझे करना
बोल ना , नया फ्लो तेरे को जमा के नही
रमता मैं जोगी तेरा रमता
गम था ज़िन्दगी में न कोई रंग था
भंग था सारा फ्यूचर मेरा भंग था
तेरे आने से पहले मैं बेरंग रंग था
लोहे में लगा जैसे कोई जंग था
ना जीने का कोई साला ढंग था
तेरी हँसी ने आंख मेरी चमकाई
आयी सपनो की रानी आई
चुराने चैन मेरा आई
लहराई, थोड़ी शरमाई ,धम से क्यों रुक गया मैं
साला सपना था ये तो फिर से पक गया मैं।

– नितिन पोरिया

है अजनबी सा एक शहर

है अजनबी सा एक शहर
ख्वाबों पर हो जैसे पहर
गुफ्तगू करने को तनहाई सिर्फ है बाकी
उलझ गई दूर कहीं खुशियों की लहर

खुद की खामियों से मै मिला हूं,
वक़्त रहते सर्दी कि धूप सा खिला हूं,
मुझे तो खुशी मिलती है औरो को हस्ता देख कर
अजनबियों से भी मै अपनों सा मिला हूं

कहीं धूप खिली है तो कहीं बादल है बरसा
समंदर का नाविक भी पानी को तरसा,
वास्तविक सुख नहीं मिला करता जनाब हर किसी को कहीं,
कोई दया का है भूखा तो कोई ममता से है तरसा

ममता से मां मुझे याद आ गई
चेहरे पर दुख की घटा सी छा गई,
कैसे बयां करू तुझको मां,
तू याद बन कर आंसू में आ गई।

-नितिन पोरिआ

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