खामोशी सी ये मुझमें जो छाई है

खामोशी सी ये मुझमें जो छाई है
बेवक्त गम की बरखा लाई है
खुद ही से अनजान हूं मै अब
क्यों फूलों संग ज़िन्दगी कांटे ये लाई है

गहरे सन्नाटे में समाई है ये जो मेरी तनहाई है
क्या कभी तुम्हे यू बेवजह नींद ना अयी है
बयां भी नहीं करसकता है क्या मर्ज मुझे
याद किसी की आती नहीं, बस एक कमी है जो अधूरी मैंने पाई है

जो हैं नहीं अपना उसको पा कैसे लू
यू मनपसंद चीज को पराया होने कैसे मै अब दू
शायद सपना हैं वो मेरा जो अधूरा रह गया बाकी
अब हकीकत में प्यार का उसको नाम कैसे मै अब दू

नहीं चाहता दिल ये फिर से हो जाए बेगाना
जिसका हो दिल वहीं दिल से मुझे लगाना
जज्बाती हूं हद से ज्यादा थोड़ा खुदगर्ज भी हूं यारो
तबीयत से सोच लू की क्या तुझको हैं अपना बनाना

अगर तू नहीं चाहती कि
मै और तू हम बनजाए
हुई है बस अभी चंद बाते
क्यों ना अभी से हम बिछड़ जाए
अगर ये दिल तुझको दे बैठा मै
तो हौसला ना होगा बिछड़ने का
मै वो पत्थर बन जाउगा
मूरत जिससे तेरी बन जाए

………नितिन poria

Published by Nitin poria

CALM WITH AGGRESIVE ATTITUDE HAVING BUNDLES OF WORDS TO DESCRIBE EVERY PHASE OF LIFE.

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