है अजनबी सा एक शहर
ख्वाबों पर हो जैसे पहर
गुफ्तगू करने को तनहाई सिर्फ है बाकी
उलझ गई दूर कहीं खुशियों की लहर
खुद की खामियों से मै मिला हूं,
वक़्त रहते सर्दी कि धूप सा खिला हूं,
मुझे तो खुशी मिलती है औरो को हस्ता देख कर
अजनबियों से भी मै अपनों सा मिला हूं
कहीं धूप खिली है तो कहीं बादल है बरसा
समंदर का नाविक भी पानी को तरसा,
वास्तविक सुख नहीं मिला करता जनाब हर किसी को कहीं,
कोई दया का है भूखा तो कोई ममता से है तरसा
ममता से मां मुझे याद आ गई
चेहरे पर दुख की घटा सी छा गई,
कैसे बयां करू तुझको मां,
तू याद बन कर आंसू में आ गई।
-नितिन पोरिआ